अशोक श्रीवास्तव की समीक्षा ‘‘रावण ही रावण को जला रहा है’’
Ashok Srivastava's review: "Ravana is burning Ravana himself."
आज विजयादशमी है। देशभर में रावण का पुतला जलाया जा रहा है। यह परंपरा वर्षों पुरानी है। हजारों लाखों रावण के पुतले जलाये गये होंगे। हैरानी इस बात की है कि आज रावण ही रावण को जला रहा है। कोई इस बात पर सोचने को बिलकुल तैयार नही है कि रावण को जलाने के लिये राम जैसा किरदार होना चाहिये। जो लोग राम के चरित्र और जीवन आदर्शों के आसपास भी नही हैं वे रावण का पुतला जलाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
दरअसल हमारी आदत है जब हम रियल लाइफ मे एक अच्छा इंसान नही बन पाते तो एक अच्छा इंसान होने का अभिनय करने लगते हैं। ये दोहरा चरित्र ही समाज को गलत रास्ते पर ले जा रहा है और जो खुद को बदलना चाहते हैं वे भी दिग्भ्रमित होकर ऐसे ही किरदारों के इर्दगिर्द अपना भविष्य तलाश रहे हैं। यदि ऐसी शर्त लग जाये कि रावण की नाभि में तीर वही मारेगा जो अपनी बुराइयों पर विजय प्राप्त कर चुका होगा या अपने भीतर के रावण को मार चुका होगा तो एक भी रावण नही जलेगा और रावण को जलाने वाले सभी सिर झुकाकर खुद का अवलोकन करना शुरू कर देंगे। लेकिन राम रावण के इस खेल में सब कुछ दिखावा है, अभिनय है प्रतीकात्मक है।
असल रावण तां हमारे आपके भीतर बैठा है। हम इसे जान भी नही पाते, समय समय पर वह हमे जिस ओर चाहता है ले जाता है, और जो चाहता है करवाता है। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम अच्छाइयों के प्रतीक है जबकि रावण बुराइयों के लिये जाना जाता है। रावण पर विजय प्राप्त करने के लिये पहले अपनी बुराइयों पर विजय प्राप्त करना होगा। यही दुनिया का सबसे बड़ा और कठिन काम है। मनुष्य का स्वभाव है, दूसरों में बुराइयां निकालना, यह एक जाहिल भी कर सकता है, विद्धान को कौन कहे, और विद्धान चाहे तो बुराइयों की झड़ी लगा दे। अपने गिरेबान में झांकने पर एक भी बुराई नही दिखती। इलाज तो तब होगा जब आप रोग को पहचान पायेंगे।
जरा सोचिये एक डाक्टर रोगी का सफल इलाज तभी कर पाता है जब उसकी जांच करवा लेता है। जांच रिपोर्ट सामने रखकर वह नुस्खा लिखता है जो रामवाण हो जाता है। अपने परिवार, समाज और देश को स्वस्थ रखना है, बुराइयों को कम करना या समाप्त करना है तो पहले खुद की जांच करनी होगी और जब खुद की जांच करना सीख जायेंगे तो आपको रोग पता चल जायेगा और आपको इसका इलाज भी करना आ जायेगा। मौजूदा परिवेश में हर घर में रावण हैं, लेकिन राम ढूढ़ते रह जायेंगे नही मिलेंगे, यही कारण है कि बुराइयां ज्यादा और अच्छाइयां कम नजर आती हैं। हर कोई कानून अपने हाथ में ले रहा है, रोजाना महिलाओं और बच्चियों संग रेप की घटनायें हो रही हैं, किसी की जान लेना तो इतना आसान हो गया है कि लोग नरसंहार तक का साहस जुटा लेते हैं।
जरा सोचिये, हम तो सैकड़ों हजारों वर्षों से रावण को जलाते आ रहे हैं फिर ये कौन है जो हत्यायें कर रहा है, महिलाओं और बच्चियों की इज्जत लूट रहा है और कानून को अपने हाथों में ले रहा है। निश्चित रूप से यही रावण है, हम सबको मिलकर इसकी नाभि में तीर मारनी होगी। लेकिन इसके लिये एक राम पर्याप्त नही हैं, हर घर में रावण हैं तो हर घर में राम को जन्म लेना होगा, तभी हम घर घर का रावण मार पायेंगे और धरती से बुराइयों को कम कर पायेंगे। यह सब हमारी आपकी संकल्प शक्ति से होगा। हमे संकल्प लेना होगा और विजयादशमी से अच्छा अवसर कभी नही आयेगा। हमारे साथ साथ आप भी अपने मन में गांठ बांध लीजिये हम अपने भीतर का रावण मारकर ही दम लेंगे। यही संकल्प हमे रामराज्य की ओर ले जायेगा जिसकी बुनियाद सर्वे भवन्तु सुखिनः के सिद्धान्त पर खड़ी होगी। जय श्रीराम!











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