जरूरी है एक अफसर का संवेदनशील होना
It is important for an officer to be sensitive
अफसरों, नेताओं के पास अपार संवैधानिक शक्ति होती है। वैसे हर इंसान को वह चाहे जिस किरदार मे हो संवेदनशील होना चाहिये लेकिन जिसके पास शक्ति होती है उसका संवेदनशील होना बहुत जरूरी है। उसकी संवेदशीलता से शासन प्रशासन की व्यवस्था व पूरा समाज प्रभावित होता है। हम जो कहना चाहते हैं उसे दो उदाहरणों के जरिये आपके सामने रखेंगे। बात कोरोना काल की है जब आईएएस आशुतोष निरंजन बस्ती के डीएम थे, लगभग 3 दशक में आशुतोष निरंजन ही इकलौते डीएम थे जो पत्रकारो और आमजनमानस से कनेक्ट थे।
कोरोना का वह दौर था जब पुलिस वाले सड़कों पर पैदल व साइकिल से भी चलने से मना करते थे। जो रोड पर आया उसे पूरा कारण बताना पड़ता था। एक आदमी ने हमे मेसेज किया कि उसे बच्चे को पिलाने के लिये दूध नही मिल रहा है। सके बाद हमने डीएम को मेसेज किया कि ‘सर इन्दिरानगर मोहल्ले में दो दिन का बच्चा है, मां को दूध नही हो रहा है और कहीं मिल भी नही रहा है’। दो मिनट नही बीता जवाब आता है ‘अशोक मै कुछ कर रहा हूं, फोन जायेगा तो उठा लेना’। फोन कटा नही कि अगली काल आ गई, सामने वाले ने बोला ‘भइया मै ग्वाला बोल रहा हूं, इन्दिरानगर में दूध कहां देना है, डीएम सर ने कहा है’।
लम्बी अवधि की पत्रकारिता का अनुभव होने के बाद भी यकीन नही हुआ कि इतना जल्दी फोन का असर होगा। मैने ग्वाला को उस परिवार का नम्बर दिया जिसे दूध की जरूरत थी, आदमी भगौना लेकर घर के बाहर खड़ा था, ग्वाला ने वहां पहुचकर दूध दिया, हमे फोन करके बताया भी। दो मिनट बाद पार्टी का फोन आया धन्यवाद देने के लिये। अगले ही क्षण डीएम सर का फोन आ गया, ‘अशोक सर्विस हो गई न’ हमने कहा थैंक्यू सर, डीएम सर ने कहा अरे यार इसकी जरूरत नही है, तुम कनेक्ट रहो हमसे, बड़ी विपरीत परिस्थिति है कुछ रहेगा तो बताना’। यह संवेदनशीला आशुतोष निरंजन के अंदर कोरोना के नाते नही आई थी बल्कि यह उनके स्वभाव का हिस्सा है।
अब रवीश कुमार गुप्ता बस्ती के डीएम हैं। जनपद के परसा जाफर में सितम्बर दूसरे, तीसरे हफ्ते में एक पागल लंगूर ने आतंक मचा रखा था। ठेला व्यापारी डर के मारे अपनी दुकान नही लगा रहे थे, करीब दो दर्जन लोगों पर हमला कर बंदर उन्हे घायल कर चुका था। दहशत इस कदर थी कि लोग घरों से बाहर नही किनल रहे थे। गांव के कोटेदार रामब्रिज प्रजापति ने हर जगह फोन करके मदद मांगा। लेकिन कोई मदद नही मिली। मीडिया दस्तक को फोन करके ग्रामीणों ने मदद मांगा। जानकारी जुटाकर 19 सितम्बर को एक खबर लिखी गई, डीएम सर को ट््वीट किया गया। कोई कार्यवाही नही हुई। अंततः एक आदमी को काटकर तेजी से भागते समय बंदर एक वाहन के नीचे आ गया उसकी मौत हो गई।
ऐसा ही एक मामला 15 दिन से बनकटी विकास क्षेत्र का चर्चा मे है। यहां भी एक पागल लंगूर ने लोगों को परेशान कर रखा है। करीब 30 लोगों को काटकर घायल कर चुका है। बेहिल के प्रधान राधेश्याम को भी बंदर ने काटा। बेहिल गांव के रहने वाले गंगाराम यादव ने बीडीओ, वन विभाग और जिलाधिकारी को इसकी जानकारी देते हुये मांग किया कि ग्रामीणों को पागल बंदर के आतंक से छुटकारा दिलाया जाये। लेकिन अफसरों में इतनी संवेदना कहां ?
बीडीओ बनकटी ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया के बंदर पकड़वाना उनका काम नही है। वन विभाग के अधिकारी ने कहा कि यह काम ग्राम पंचायत का है, इसकी जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की है। विभाग ने साक्ष्य के तौर पर इस आशय का आदेश भी दिखाया। यह आदेश बीडीओ को दिखाया गया तो उन्होने कहा हम वन विभाग के अधिकारी का आदेश मानने को विवश नही हैं। हमे पंचायती रजा विभाग आदेश देगा तब वह हम पर प्रभावी होगा। डीएम से कहा गया तो अर्दली ने ही निपटा दिया। सैंदवारे गांव के रहने वाला गोण्डा में तैनात सिपाही दिवाली में अपने गांव आया था, उसे भी पागल बंदर ने काटकर घायल कर दिया। गूमानारी गांव की 80 साल की बुजुर्ग समुनरा देवी को पागल बंदर ने काटकर घायल कर दिया।
बंदरके हमले से वे गिर पड़ी सिर में गंभीर चोट लगी है, डाक्टर ने जवाब दे दिया गोरखपुर मेडिकल कालेज से वापस घर आ गईं, मरणासन्न हैं। कुल मिलाकर कहा जाये तो नागरिकों को बानर काटे, सांड पटक दे, तेंदुआ उठा ले जाये, अफसरों की कोई जिम्मेदारी नही है। आप बस्ती जिले में तैनात दोनो जिलाधिकारियों की कार्यशैली में अंतर समझ सकते हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है अफसरों का संवेदनशील न होना नागरिकों के लिये कितना खतरनाक है। जिला प्रशासन की उदासीनता के बाद अब ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर बंदर पकड़ने के लिये शिकारी बुलवाया है जिससे ग्रामीणों को राहत मिले और जानलेवा हमलों से सभी की रक्षा हो सके।













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