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संगम स्नान के लिये पालकी पर जा रहे शंकराचार्य को पुलिस ने रोका, साधुओं के साथ की अभद्रता



संगम स्नान के लिये पालकी पर जा रहे
शंकराचार्य को पुलिस ने रोका, साधुओं के साथ की अभद्रता

यूपी डेस्कः प्रयागराज के माघ मेले मे हंगामे की खबर है। पालकी पर सवार होकर जा रहे शंकराचार्य स्वामी अविमक्तेश्वरानंद को पुलिस ने पालकी से उतरकर पैदल जाने को कह दिया। शंकराचार्य पालकी से संगम नोज तक जाना चाहते थे। जबकि प्रशासन उनसे पैदल जाकर स्नान करने को कह रहा था। इसी टकराव और हगामें के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम वॉच टॉवर के पास वापसी मार्ग पर करीब 3 घंटे तक खड़े रहे।



कमिश्नर सौम्या अग्रवाल, पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार और डीएम मनीष कुमार वर्मा के मनाने के बाद भी जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नहीं माने तो पुलिस ने उनको बलपूर्वक वहां से हटाना शुरू किया। इस दौरान साधु- संन्यासियों के विरोध के चलते हाथापाई भी हुई। शंकराचार्य को अज्ञात स्थान पर ले जाया गया और उनके अनुयायियों को पुलिस ने हिरासत मे ले लिया। इस बीच पालकी का छत्रप भी टूट गया जिससे शंकराचार्य के शिष्यों का गुस्सा और भड़क गया। पुलिस पर साधू संतों की पिटाई करने का आरोप है। फिलहाल शंकराचार्य ने अपने समर्थकों के साथ धरना शुरू कर दिया है। उन्होने कहा सरकार हमसे बदला ले रही है क्योंकि हमने महाकुंभ मे मची भगदड़ पर सवाल उठाकर सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। 


अनुयायियों का आरोप है कि शंकराचार्य के रथ को पुलिस के जवानों ने सादी वर्दी में खींचकर संगम नोज से 1 किलोमीटर दूर छोड़ दिया. यह शंकराचार्य का अपमान है. इस तरह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बिना मौनी अमावस्या स्नान के ही वापस लौट गए. जिस समय पुलिस साधुओं को बल पूर्वक हटा रही थी शंकराचार्य काफी क्रोध में नजर आए। उन्होने बताया कि पिछले 39 सालों से वह इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मौनी अमावस्या का स्नान करते रहे हैं. शंकराचार्य होने के बाद गरिमा के अनुरूप उन्होंने पालकी पर सवार होकर संगम स्नान करते रहे हैं. शिविर से मुझे पुलिस अधिकारियों ने ही अपनी सुरक्षा में लेकर संगम नोज तक पहुंचाया था।


मैं रथ पर इसलिए सवार होकर आया था कि यहां लाखों श्रद्धालु आए हैं। अगर मैं पैदल जाता तो वह मुझे प्रणाम करने, मुझसे बात करने का प्रयास करते. ऐसे में भगदड़ मच सकती थी. इसलिए मैंने रथ पर सवार होकर संगम स्नान का फैसला किया. इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण यह था कि रथ पर ऊंचाई पर बैठकर में श्रद्धालुओं के अभिवादन का जवाब दे सकता था. इससे कोई अव्यवस्था नहीं फैल रही थी. मैं संगम के करीब पहुंच गया था, लेकिन अधिकारियों ने मेरे अनुयायियों और साधुओं के साथ अभद्रता और मारपीट की, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मैं शंकराचार्य हूं और अपने गरिमा के अनुरूप ही पालकी से मौनी अमावस्या के स्नान के लिए जाना चाह रहा था।

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