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निशाना चूक रहा है या लक्ष्य पर मारी जा रही गोली, यूपी S.T.F. को ट्रेनिंग की जरूरत

निशाना चूक रहा है या लक्ष्य पर मारी जा रही गोली, यूपी S.T.F. को ट्रेनिंग की जरूरत Is the target missing or is the bullet being fired at the target, UP S.T.F. needs training



अशोक श्रीवास्तव की समीक्षा जरूर पढ़ें।
यूपी एसटीएफ ने सुल्तानपुर डकैती कांड में एक और बदमाश अनुज प्रताप सिंह को एनकाउंटर मे ढेर कर दिया। मंगेश यादव के एनकाउटर के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर चौतरफा जातिवादी होने के आरोप लगे थे। मुख्यमंत्री को पता नही इसको लेकर कोई मलाल था कि नही, एसटीएफ ने सुल्तानपुर डकैती कांड के दूसरे आरोपी को भी टपका दिया।


एक गलती सुधारने के लिये दूसरी गलती। ऐसी न जाने कितनी गलतियां अभी योगी आदित्यनाथ की सरकार को करनी है। वक्त जैसे जैसे बीतता जायेगा आम जनता को इसका अहसास होता जायेगा। क्योंकि योगी आदित्यनाथ जिस रामराज्य की कल्पना के साथ आगे बढ़ रहे हैं वह नफरत, बुलडोजर, जातिवाद, पक्षपात, दोहरे चरित्र, अहंकार और असंवैधानिक परंपराओं की बुनियाद पर किसी कीमत पर नही लाया जा सकता।


पता चला है कि एसटीएफ ने अनुज प्रताप सिंह के सिर में गोली मारी। यही हाल मंगेश यादव का था। उसे भी सिर और हाथ में गोली लगी थी। मसलन पुलिस या तो जानबूझकर लोगों की जान ले रही है या फिर पुलिस का निशाना चूक रहा है। दोनो बातें गंभीर हैं। ऐसे में एक बात बहुत जरूरी है, यूपी एसटीएफ को प्रशिक्षण में भेज देना चाहिये, ताकि ट्रेनिंग के समय सिखाई गयी बातें फिर से ताजा हो जाये और गोली सही निशाने पर यानी कमर से नीचे लगे। लानत है एसटीएफ पर जो दर्जन भर सिंघम मॉडल सिपाहियों और तेज तर्राक प्रभारी के होते हुये अपराधियों को जिंदा पकड़ने में नाकाम साबित हो रहे हैं।


एसटीएफ इतनी सक्रिय है कि आपराधिक मामलों में आरोपी को घर से उठा ले जा रही है और फर्जी स्क्रिप्ट तैयार कर मुठभेड़ दिखाया जा रहा है। इससे न केवल अभियुक्त मर रहा है बल्कि न्यायिक व्यवस्था भी दम तोड़ रही है। मौजूदा व्यवस्था दो चार चलती रही तो वह दिन जल्दी आयेगा जब अदालतें महत्वहीन हो जायेंगी और लोगों का न्याय से भरोसा उठ जायेगा। सोचिये परिस्थितियां कितनी भयावह होंगी। आदमी खुद ही फैसले लेना शुरू कर देगा और चारों ओ हिंसा का वातावरण बन जायेगा। इसे रोकना होगा। पुलिस कस्टडी और न्यायिक अभिरक्षा में भी होने वाली मौतें व्यवस्था के ऊपर कलंक हैं। निश्चित रूप से सरकार और व्यवस्था दिशाहीन है। आपराधिक मामलों में कड़े से कड़ा बनना और लागू होना चाहिये किन्तु सजा देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट का हो।

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