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अशोक श्रीवास्तव की समीक्षा ‘’हर पत्रकार डरपोक नही होता’’



अशोक श्रीवास्तव की समीक्षा ‘’हर पत्रकार डरपोक नही होता’’
एस.आई.आर. बिहार में चल रहे मतदाता परीक्षण अभियान के बारे में ग्राउण्ड रिपोर्टिंग कर रहे मशहूर पत्रकार अजीत अंजुम के खिलाफ बेगूसराय जिले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज किया है। एक बीएलओ ने शिकायत की है कि वे काम में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं और सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार में मतदाता सूची के लिए की जा रही धाँधली को अपनी ग्राउंड रिपोर्ट के जरिये दिखाने वाले पत्रकार अजीत अंजुम पर बिहार में हुई एफआईआर की हम निंदा करते हैं। कानून की आड़ लेकर किसी भी पत्रकार को परेशान नही किया जाना चाहिए। 


पत्रकार अपना काम करता है आप अपना करिए। पत्रकार ने सवाल उठाया उसका जवाब देना आपकी जिम्मेदारी है। यदि आप जवाबदेही से भाग रहे हैं तो निःसंदेह कोई षडयंत्र कर रहे हैं या फिर कुछ छिपा रहे हैं। अजीत अंजुम ने बिहार में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर हो रही धांधली को उजागर किया है। आधे अधूरे आवेदन पत्रों को अपलोड़ किये जाने पर जनता और विपक्ष का ध्यान खींचा है। बगैर मतदाता के हस्ताक्षर और फोटो के धड़ल्ले से वोट बनाये जा रहे हैं। आधे अधूरे आवेदन पत्रों को सिस्टम पर अपलोड करवाया जा रहा है। ऐसे न जाने कितने लोग मतदाता बनाये जा चुके हैं जो वोटर नही हैं या उनकी पात्रता नही है। ये सच है तो ये भी सच है कि सत्ताधारी दल ऐसे वोटरों से ही अपनी बढ़त बनायेगा और एक बार फिर सत्ता हथियाने में कामयाब रहेगा।


बेहतर होता चुनाव आयोग मतदाताओं का विश्वास जीतने के लिये अपनी सफाई पेश करता या फिर अंजुम की रिपोर्ट को गलत ठहराता। किन्तु ऐसा न करके एक बीएलओ को मोहरा बनाकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई जो चुनाव आयोग को मिली शक्ति का दुरूपयोग है। सिस्टम का दुरूपयोग कर अजीत अंजुम को डराने की कोशिश की जा रही है। पत्रकार डर गया तो लोकतंत्र की बुनियाद हिल जायेगी। अजीत अंजुम जैसे पत्रकार देश में मुट्ठी भर ही बंचे हैं लेकिन अहंकार में डूबी तानाशाह सरकारों पर भारी पड़ रहे हैं। फिलहाल इस एफ.आई.आर. ने निर्लज्ज चुनाव आयोग की पोल खोल कर रख दी है। जबकि अजित अंजुम सीना तानकर खड़े हैं और खबर को गलत ठराने की चुनाव आयोग को लगातार चुनौती दे रहे हैं।


हैरानी इस बात की है कि अजीत के इतने बड़े खुलासे के बाद विपक्ष कहाँ सो रहा है ? सत्ताधारी दल जो षडयंत्र रच रहा है उसका साइड इफेक्ट सीधे विपक्ष को ही झेलना है। लेकिन चुप्पी बेहद खतरनाक है जो मतदाता सूची में की जा रही धांधली को प्रोत्साहित कर रही है। फिलहाल शासन सत्ता की ये पुरानी फितरत है। पत्रकार की किसी खबर या स्टोरी से खास तकलीफ होती है तो कोई अफसर या नेता सीधे सामने नही आता है, हमेशा एक मोहरा खड़ा करता है। उसका इस्तेमाल पर पत्रकार के खिला गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करवा देता है। हमे खुद की आपबीती याद आ गई। करीब 5 साल पहले बस्ती जिले की पुलिस ने ऐसे ही एक मामले में थर्ड पार्टी को मोहरा बनाकर मेरे ऊपर रंगदारी मांगने का केस दर्ज कराया था। मै सच्चाई के रास्ते पर था और पुलिस को थूक कर चाटना पड़ा था।


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