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जब समाज सवाल करता है, तब खुद को जवाब देना सीखिए- Nihharika की नज़र




जब समाज सवाल करता है, तब खुद को जवाब देना सीखिए

Nihharika की नज़र

समाज सवाल करता है।

अक्सर बिना सोचे, बिना समझे और बिना हालात जाने।

आप क्या कर रही हैं?                                                               

आपकी उम्र क्या है?

आप अकेली क्यों हैं?

आपने ये रास्ता क्यों चुना?

आपने “वो” क्यों नहीं किया जो सब करते हैं?

सवालों की ये सूची कभी खत्म नहीं होती। और सबसे ज़्यादा सवाल उस औरत से पूछे जाते हैं, जो अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने की कोशिश करती है।

मैंने यह बहुत करीब से देखा है।

और यह भी सीखा है कि समाज को जवाब देने की कोशिश में हम खुद से सवाल करना भूल जाते हैं।

समाज को नहीं, खुद को जवाब दीजिए

एक समय था जब मैं भी समाज के सवालों से डरती थी।

लोगों की नज़र, उनकी बातें, उनकी फुसफुसाहट—सब कुछ मुझे असहज कर देता था। मैं सोचती थी कि अगर मैं चुप रहूँगी, अगर मैं अपने सच को छुपा लूँगी, तो शायद लोग सवाल करना बंद कर देंगे।

लेकिन सच ये है—

लोग कभी सवाल करना बंद नहीं करते।

आप चुप रहें या बोलें,

आप सही करें या गलत,

आप सफल हों या संघर्ष में—

समाज हमेशा कुछ न कुछ कहेगा।

फर्क सिर्फ़ इतना है कि आप उस शोर को अपने भीतर जगह देते हैं या नहीं।


चुप्पी हमेशा ताक़त नहीं होती

हमारी परवरिश हमें सिखाती है—

“चुप रहो, बात बढ़ेगी।”

“लोग क्या कहेंगे?”

“औरत को सब सहना चाहिए।”

लेकिन कोई हमें यह नहीं सिखाता कि कब चुप्पी ज़हर बन जाती है।

जब आप हर सवाल का बोझ अपने दिल में रख लेते हैं,

जब हर ताना आपको खुद पर शक करने पर मजबूर कर देता है,

जब आप अपनी काबिलियत को दूसरों की राय से तौलने लगते हैं—

तब चुप रहना समझदारी नहीं, खुद के साथ अन्याय होता है।


ज़िंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई – अपने अंदर से

मैंने समझा है कि ज़िंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई बाहर नहीं, अंदर होती है।

वो आवाज़ जो कहती है—

“शायद लोग सही कह रहे हैं।”

“शायद मैं ही गलत हूँ।”

“शायद मुझे अपनी जगह नहीं लेनी चाहिए।”

जब तक यह आवाज़ आपके अंदर रहती है, तब तक समाज जीतता रहता है।

लेकिन जिस दिन आपने खुद से यह कह दिया—

“मैं अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा जवाब खुद हूँ”

उस दिन से खेल बदल जाता है।

Single Parent, Working Woman, Leader — Labels नहीं, पहचान

आज हम Labels में जी रहे हैं।

Single Parent.

Working Woman.

Career Oriented.

Strong Woman.

लेकिन सच यह है कि इंसान Labels से बड़ा होता है।

Single Parent होना मेरी मजबूरी नहीं, मेरी ताक़त है।

क्योंकि मैंने अकेले फैसले लेना सीखा।

अकेले गिरना और उठना सीखा।

और सबसे ज़रूरी—अकेले खड़े रहना सीखा।

कामकाजी होना मेरे बच्चों से दूर होने का सबूत नहीं,

बल्कि उन्हें यह दिखाने का तरीका है कि

संघर्ष से डरकर भागा नहीं जाता।


Leadership बाहर नहीं, अंदर से शुरू होती है

हम अक्सर Leadership को पद, कुर्सी या अधिकार से जोड़ते हैं।

लेकिन असली नेतृत्व तब शुरू होता है जब—

आप डर के बावजूद सही फैसला लेते हैं।

आप अकेले खड़े होने की हिम्मत रखते हैं।

आप अपनी कहानी पर शर्मिंदा नहीं होते।

एक औरत जब अपनी ज़िंदगी की कमान खुद संभाल लेती है,

तो वह सिर्फ़ अपने लिए नहीं—

दूसरी औरतों के लिए भी रास्ता खोलती है।


यह कॉलम क्यों?

“Nihharika की नज़र” कोई उपदेश नहीं है।

यह उन सवालों की बात है जो हम सबके मन में होते हैं, लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं होती।

यह उन सच्चाइयों की जगह है जिन्हें अक्सर “असुविधाजनक” कहकर दबा दिया जाता है।

मैं यहाँ यह नहीं कहती कि मेरे फैसले परफेक्ट हैं।

मैं यह कहती हूँ कि वे मेरे हैं।

और शायद यही आज की सबसे बड़ी आज़ादी है।


आख़िरी बात

अगर आज समाज आपसे सवाल कर रहा है,

तो रुकिए… और खुद से पूछिए—

क्या मैं अपनी ज़िंदगी अपने सच के साथ जी रही हूँ?

क्या मैं अपने डर से नहीं, अपने विश्वास से फैसले ले रही हूँ?

क्या मैं खुद को रोज़ जवाब दे पा रही हूँ?

क्योंकि जिस दिन आपने खुद को जवाब देना सीख लिया,

उस दिन समाज के सवाल सिर्फ़ आवाज़ बनकर रह जाएँगे—

और आपकी ज़िंदगी, आपकी शर्तों पर चलेगी।

✍️ — Nihharika








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