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सुख दुःख का कारण जो अपने अन्दर खोजे वही सन्त है- स्वरूपानन्द जी महाराज



सुख दुःख का कारण जो अपने
अन्दर खोजे वही सन्त है- स्वरूपानन्द जी  महाराज 

बस्ती, 27 मार्च।
मनुष्य को उसका कर्म ही सुख या दुःख देता है। सुख दुःख का कारण जो अपने अन्दर खोजे वही सन्त है। जीव को अपने कर्म के कारण जन्म लेना पड़ता है और ईश्वर स्वेच्छा से प्रकट होते हैं। कुसंग तो हर किसी को बिगाड़ देता है। कुसंग के कारण ही कैकेयी की मति भ्रष्ट हो गयी और अपने पति दशरथ का अपमान कर कैकेयी ने श्रीराम के लिये 14 वर्ष का वनवास मांग लिया। 


‘‘तापस वेष बिसेषि उदासी। चौदह बरसि रामु वनवासी।। यह सद् विचार कथा व्यास स्वरूपानन्द जी  महाराज ने नारायण सेवा संस्थान ट्रस्ट द्वारा आयोजित 9 दिवसीय संगीतमयी श्रीराम कथा दुबौलिया बाजार के राम विवाह मैदान में आठवें दिन व्यक्त किया। श्रीराम वन गमन, केवट प्रसंग आदि के माध्यम से श्रीराम कथा को विस्तार देते हुये वेदान्ती जी ने कहा कि सभी प्रकार की अनुकूलता होते हुये यदि मन किसी विषय में न जाय वही वैराग्य है। वनवास से जीवन में सुवास आता है। प्रभु श्रीराम ने वनवास कर जगत का कल्याण किया। 


महात्मा जी ने कहा कि राम तो परमानन्द स्वरूप है। जो उनका स्मरण करते हैं उन्हें दुख नहीं होता। विभिन्न प्रसंगो के क्रम में महात्मा जी ने कहा कि जीवन में कुछ नियम होने चाहिये। जिसके जीवन में कुछ शुभ संकल्प नही है वह पशु से भी अधम है। श्रीराम का वनवास में जगत के कल्याण का हेतु है। श्रीराम कथा के आठवें दिन कथा व्यास का विधि विधान से मुख्य यजमान संजीव सिंह ने पूजन किया। आयोजक बाबूराम सिंह, अनिल सिंह सहयोजक राना दिनेश प्रताप सिंह पूर्व प्रमुख विक्रम सिंह शाखा प्रबंधक हरिश्चंद्र पांडे नंदकिशोर पांडे गणेश तिवारी अजय मिश्रा जी शुक्ल के साथ बड़ी संख्या में क्षेत्रीय नागरिक श्रीराम कथा में उपस्थित रहे।

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