आम आदमी आज भी
जनरल बोगियों मे खा रहा है धक्के, ये कैसा विकास
अक्षरा बाजपेई द्वारा लिखितः वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में भारतीय रेलवे के आधुनिकरण सुरक्षा और यात्री सुविधाओं के लिए रिकॉर्ड धनराशि आवंटित की गई है। वंदे भारत, अमृत भारत और नमो भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों के विस्तार के साथ भारतीय रेल विकास की नई ऊंचाइयों को छूने का प्रयास कर रही है। सरकार द्वारा नई ट्रेनों का संचालन बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाओं का विस्तार निश्चित रूप से सराहनीय है।
लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा वर्ग है जिसकी समस्याएं आज भी जस के तस बनी हुई हैं यह वर्ग है देश का आम यात्री जो प्रतिदिन जनरल डिब्बों में सफर करता है। आज भी देश की बड़ी आबादी आर्थिक रूप से सामान्य श्रेणी की यात्रा पर ही निर्भर है। मजदूर, छात्र, छोटे व्यापारी, नौकरी पेशा, कर्मचारी तथा निम्न एवं मध्यम वर्ग के लोग अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए जनरल डिब्बों में यात्रा करते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश ट्रेनों में जनरल डिब्बों की संख्या यात्रियों की तुलना में बहुत कम हैं।
परिणामस्वरुप यात्रियों को अत्यधिक असुविधा और कई बार असुरक्षित परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है कई यात्रियों को दरवाजे पर खड़े होकर अथवा पायदान पर लटक कर या घंटों तक मजबूरन खड़े होकर ही यात्रा करनी पड़ती है। एक ओर आधुनिक और वातानुकूलित ट्रेनों का विस्तार हो रहा है, वहीं दूसरी ओर सामान्य श्रेणी की यात्रियों की समस्या लगातार बनी हुई है। वंदे भारत जैसी ट्रेनों ने भारतीय रेल की आधुनिक छवि को मजबूत किया है, लेकिन उनका किराया देश के हर नागरिक की पहुंच में नहीं है। आम नागरिक प्रतिदिन इन ट्रेनों से यात्रा नहीं कर सकता।
उसकी पहली आवश्यकता आज भी सुरक्षित सस्ती और समय पर चलने वाली रेल सेवा ही है। समस्या केवल भीड़ तक ही सीमित नहीं है। समयपालन की भी एक बड़ी चुनौती बनी हुआ है। अनेक ट्रेन निर्धारित समय से विलंब समय से पहुंचती हैं। जिससे यात्रियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थी,नौकरी के लिए यात्रा करने वाले युवा आवश्यक कार्यों से आने जाने वाले नागरिक इसेसे प्रभावित होते हैं। कई बार परीक्षा केंद्र पर समय पर पहुंचने की चिंता के कारण विद्यार्थियों को निजी साधनों का सहारा लेना पड़ता है।
यदि यात्री समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचने को लेकर आश्वस्त न हो तो,परिवहन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। रेल परिवहन के साथ-साथ सार्वजनिक बस सेवाओं की स्थिति भी अनेक स्थानों पर संतोषजनक नहीं है। बसों का विलंब से चलना यात्रियों की अधिक संख्या तथा मार्ग में होने वाली अनावश्यक देरी जनता की परेशानियों को और बढ़ा देती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि परिवहन क्षेत्र में बड़े निवेश और नई योजनाओं के बावजूद आम नागरिक को अपेक्षित सुविधा क्यों नहीं मिल पा रही है। यह कहना उचित नहीं होगा कि विकास नहीं हो रहा है।
भारतीय रेल में व्यापक सुधार हो रहे हैं और आधुनिक सुविधाओं का विस्तार भी लगातार जारी है। किंतु विकास का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यदि करोड़ों यात्री आज भी भीड़, असुविधा, देरी और मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं, तो यह संकेत है कि अभी और सुधार की आवश्यकता है। सरकार और रेलवे प्रशासन को चाहिए कि आधुनिक ट्रेनों के विस्तार के साथ-साथ सामान्य श्रेणी के यात्रियों की आवश्यकताओं पर भी विशेष ध्यान दें।
जनरल डिब्बों की संख्या बढ़ाई जाए स्वच्छता और सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जाए तथा ट्रेनों के समय पालन में सुधार लाया जाए । विकास की गति और आम नागरिक की सुविधा, दोनों को साथ लेकर चलना ही सच्चे अर्थों में समावेशित विकास कहलाएगा। रेल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की जीवन रेखा है। इसलिए आवश्यक है कि विकास की इस यात्रा में आम नागरिक स्वयं को उपेक्षित नहीं, बल्कि सहभागी महसूस करें। जब जनरल डिब्बों में सफर करने वाला यात्री भी सम्मानजनक, सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा का अनुभव करेगा, तभी रेल के विकास के दावे हकीकत का सामना कर पायेंगे।।







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