अनाथ बेटियों का सहारा बनी आजमगढ़ पुलिस, एक महीने का वेतन देंगे एसपी
5000 से ज्यादा पुलिसकर्मी एक दिन का वेतन देकर करेंगे बेटियों की मदद
यूपी डेस्कः आम तौर पर पुलिस के प्रति लोगों की धारणा गलत होती है। ऐसा बहुत कम लोग सोच पाते हैं कि पुलिस के भीतर भी संवेदनायें होती हैं और उसका अपना भी एक परिवार होता है। यदि देश का हर नागरिक कानून का सम्मान करे तो पुलिस के काम आधे हो जायेंगे, क्राइम कम हो जायेगा, परिवार खुशहाल हो जायेगा और कोई बेवजह किसी को परेशान नही करेगा।
लेकिन पुलिस की मजबूरी है वह निष्पक्ष नही रह पाती। उसे शासन सत्ता के दबाव मे काम करना पड़ता है। यूपी के आजम गढ़ मे पुलिस का एक ऐसा मानवीय चेहरा सामने आया है जिसने सभी को भावुक कर दिया है। दरअसल कुछ दिन पहले यहां बहुत बड़ी घटना घटी। आजमगढ़ में पत्नी-बेटे और दो पंडितों की गोली मारकर हत्या करने वाले शख्स को पुलिस ने जेल भेज दिया। उसकी दो बेटियां अनाथ बेटियां अनाथ हो गई थीं। उनका भविष्य अंधकारमय हो गया था। लेकिन एक ओर जहां उन बेटियों के पिता को कड़ी सजा दिलाने के लिये पुलिस पैरवी कर रही है।
वहीं इन अनाथ बेटियों के लिये वही पुलिस फरिश्ता बनकर आई है। अहिरौला (एरोला) इलाके में हुये ताबड़तोड़ चार हत्याओं के बाद पुलिस का ऐसा चेहरा सामने आया है, जिसने आमजन मानस को भावुक कर दिया है। आजमगढ़ के एसपी डॉ. अनिल कुमार ने दोनों बेटियों को गोद लेकर 18 वर्ष की उम्र तक उन्हे पढ़ाने का फैसला लिया है. वहीं, जिले के 5000 हजार कर्मियों के एक दिन की सैलरी देकर एफडी कराने का भी फैसला किया गया है। घटना के बाद आरोपी अरविंद कुमार सिंह की गिरफ्तारी से उसकी बेटियां पूरी तरह बेसहारा हो गई थीं। इस बात का संज्ञान लेते हुए एसपी डॉ. अनिल कुमार ने बेटियों को गोद लेने का मानवीय फैसला लिया।
बच्चियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए एसपी ने अपनी एक महीने की पूरी तनख्वाह दान कर दी है. इतना ही नहीं, आजमगढ़ पुलिस के लगभग 5000 से अधिक पुलिसकर्मियों ने भी अपनी एक-एक दिन की तनख्वाह इन बच्चियों की मदद के लिए दी है। पुलिसकर्मियों द्वारा इकट्ठा की गई यह पूरी धनराशि बच्चियों के सुरक्षित भविष्य के लिए उनके नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में बैंक में जमा कराई जाएगी. इस एफडी का मालिकाना हक बच्चियों की देखभाल कर रहीं उनकी दादी मां के पास होगा। इसके अतिरिक्त, बच्चियों की 18 वर्ष की आयु तक शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए जिला प्रशासन की तरफ से हर माह ढाई-ढाई हजार रुपये (कुल 5000 रुपये) की विशेष व्यवस्था की जा रही है। इससे ये लगता है कि तमाम गिरावटों और लगातार जानवर बनते जा रहे आदमियों के बीच इंसानियत अभी जिंदा है।





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