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कौन है समाजसेवी ?


 

कौन है समाजसेवी ?
अशोक श्रीवास्तव की समीक्षा:
बस्ती मे समाजसेवियों को लेकर सोशल मीडिया पर बहंस हो रही है। असल मायने मे समाजसेवा किसे कहते हैं इसको लेकर भ्रातियां हैं, और जब समाजसेवा को लेकर भ्रांतियां हैं तो यह तय करना भी कठिन है कि कौन समाजसेवी है। अनगिनत लोग समाजसेवा के क्षेत्र मे आते हैं, नाम बड़ा हो जाता है तो पद तलाशने लगते हैं और जब पद मिल जाता है तो पैसा। अभी तक यही परंपरा रही है।

यहां तक कि आज जो राजनीति के शीर्ष पदों पर हैं इनकी भी एन्ट्री समाजसेवा से हुई थी। आप ढूढ़ डालिये समाजसेवियों के पोस्टर बैनर से पूरा शहर रहता है। कुछ लोग डाक्टर और वकील को समाजसेवी मानते हैं। लेकिन ऐसा नही है, ये अपनी सेवायें देने के लिये पैसा लेते हैं। सहानुभूति इनके लिये हाशिये पर होती है। पैसा लेकर सेवा अच्छी कर दें, मरीजों की उचित देखभाल करें यही उनकी समाजसेवा है। वहीं दूसरी ओर मेहनताना लेकर वकील अपने मुवक्किल को परेशानी से बंचा ले, उसकी यही समाजसेवा है।

स्कूल चलाने वाला बच्चों से फीस लेकर उसे पढ़ाता है यह भी समाजसेवा के दायरे मे नही आता। वह अच्छी शिक्षा और संस्कार दे यही उसकी समाजसेवा है। इसी भीड़ मे पत्रकार भी आता है। पत्रकारों का कोई मानदेय नही है। कभी कभार कुछ विज्ञापन मिल जाता है, उसके चार हिस्सों मे एक हिस्सा उसका होता है। लेकिन इससे वह अपनी गाड़ी का पेट्रोल भी नही भरा सकता। ऐसे मे पत्रकार को कोई कुछ देता है या उसे कुछ मिल जाता है तो यह न रिश्वत है और न ही उसका मानदेय। यह भी न मिले तो वह एक महीने भी पत्रकारिता नही कर पायेगा।

हालांकि समाज को सारी उम्मीदें पत्रकारों से रहती हैं लेकिन विज्ञापन देने की बात आती है तो लोग फोन उठाना या बोलना बंद कर देते हैं। माना जाये तो पत्रकारिता सच्चे अर्थों मे समाजसेवा है। समाजसेवियों को जानने पहचानने के लिये कुछ लोगों का नाम लेकर चर्चा करना मजबूरी है, वरन भ्रांतियां बनी रह जायेंगी। इसी भीड़ मे एक शख्स ऐसा भी है जो बस्ती मे पेड़ लगाता है, उसे ट्री गार्ड से सुरक्षा देता है और समय समय पर उसकी शाखाओं को काटता छांटता भी है। इसमे वह किसी से मदद नही लेता।

कभी यह भी नही सुना गया कि वह नगरपालिका, विधानसभा या संसदीय चुनाव लड़ेगा। उसने कभी अपनी दूसरी संस्था का प्रचार प्रसार भी नही किया जिसे समाजसेवा का अपरोक्ष लाभ मिले। नाम जानना चाहेंगे तो उसका नाम गौहर अली है। वह ऐसे समुदाय से है जिसके लिये यह कालखण्ड अनुकूल नही है, लेकिन उसके ऊपर इसका कोई फर्क नही पड़ता। कांवड़ यात्रा खत्म हुई, शिव मंदिरों पर लाखों श्रद्धालु पहुंचे, कूड़ा करकट फैलाकर चले गये। न कई मंदिरों पर टीम के साथ पहुंचकर गौहर अली ने अपने हाथों से गंदगी साफ किया।

इसी भीड़ मे एक चेहरा और है जो लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार कराता है। बहुत कम लोग उसे जानते हैं, मै भी नही जानता। वह असंख्य लाशों का अंतिम संस्कार करा चुका है लेकिन उसकी गतिविधियां मीडिया से दूर हैं। इसका एक कारण और भी है, दरअसल कई मीडिया संस्थान ऐसी गतिविधियों को खबर ही नही मानते। कोरोना काल मे जब लोग अपने ही परिजनों की लाशों से दूर रहते थे, तब भी उसने लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार कराया। यह मामूली बात नही है। लोग अपने पूर्वजों की देखभाल नही कर पा रहे हैं ऐसे मे उस व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला यह कार्य उत्कृष्ट समाजसेवा मे आता है।

दरवाजों पर पशु पक्षियों के लिये पानी रखना, भूखे को भोजन देना, पौधे लगाना, समाज को बुराइयों से बाहर निकालने का प्रयास करना, लोगों को अवसाद से उबारना, बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना, बेबस लाचार बच्चों, बुजुर्गों को गोद लेना, फ्री मेडिकल कैंप लगाना, ब्लड डोनेट करना, रेस्क्यू का हिस्सा बनना, लोगों को आत्मनिर्भर बनाना, जरूरतमंदों को आय के अवसर उपलब्ध कराना, बेटियों की शादी मे मदद करना, भू्रण हत्या रोकने का प्रयास करना, पर्यावरण को प्लास्टिक से मुक्ति दिलाना माजसेवा है। 

अपने चिकित्सा सेवा काल मे डा. वी.के. वर्मा ने किसी मरीज से आज तक कोई परामर्श शुल्क नही लिया, उनके अस्पताल मे कोई भर्ती शुल्क या बेडचार्ज भी नही लिया जाता। यह समाजसेवा है। कोरोना काल मे जब लोग मरीजों को छूना नही चाहते थे उस वक्त डा. वर्मा ने जान जोखिम मे डालकर मरीजों की सेवा की और उनका उपचार किया। यह समाजसेवा है। डा. डीके गुप्ता भी कसौटी पर कई मायने मे खरा उतरते हैं। डा. रमेशचन्द्र श्रीवास्तव ने ऐसी लकीर खींची है जो हर पीढ़ी के लिये प्रेरणा स्रोत है। 

सिद्धार्थनगर के देवेशमणि त्रिपाठी ने निःस्वार्थ भाव से बस्ती मंडल के हजारों टीबी रोगियों को गोद लिया है। बस्ती मे चपपेड़िया रोड के सुबाष श्रीवास्तव चुपके से मदद करते हैं जिनके बारे मे कोई जानता ही नहीं। बुजुर्ग कहते हैं मदद ऐसी होनी चाहिये कि एक हाथ दे तो दूसरे को पता न चले। लेकिन इस बात पर हंसी आती है। यह किसी कालखण्ड मे सटीक रहा होगा, लेकिन इस कालखण्ड मे तो मदद पहुंचाने से ज्यादा इसका शोर करने की परंपरा कायम है। 

दरअसल जो लोग समाजसेवा से जुड़े होते हैं उनके प्रति लोग अच्छी धारणा और सहानुभूति रखते हैं। इसलिये लोगों की सहानुभूति पाने और उनसे सीधा कनेक्ट होने के लिये समाजसेवा एक बेहतर माध्यम है। राजनीति मे मुकाम बनाने के लिये पहले लोग इसी प्लेटफार्म पर आते हैं। लेकिन आम जनमानस को ऐसे लोगों की गतिविधियों पर नजर रखना चाहिये। कहीं क्षणिक लाभ पहुचाकर हमे मानसिक गुलाम और वैचारिक दरिद्र तो नही बनाया जा रहा है। जरूरी है वैचारिक मजबूती बनी रहे, इस्तेमाल होने से बचें और अपना वजूद समझें।

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