राम ने सीता के सम्मान के लिये नहीं,
अपने कुल की मर्यादा के लिये रावण से युद्ध किया- सीतायण से
कोई भी कालखण्ड रहा हो, पुरूष सत्ता को ही प्राथमिकता मिलती रही और स्त्रियों को तरह तरह की यातनायें सहन करनी पड़ी। स्त्रियां न्याय के लिये कल भी जद्दोजेहद कर रही थीं और आज भी। वरिष्ठ पत्रकार एवं कौटिल्य का भारत अखबार के संपादक राजेन्द्रनाथ तिवारी द्वारा लिखी जा रही सीतायण इसी प्रसंग पर आधारित एक व्यापक विमर्श है जो प्रकाशित होने के बाद निःसंदेह चर्चाओं का रूख मोड़ने मे समर्थ होगी और एक नये वैचारिक संघर्ष को जन्म देगी। सीतायण का एक अंश मीडिया दस्तक के माध्यम से आप तक पहुंच रहा है। सीता को धर्म के मार्ग पर चलने पर भी कष्ट सहना पड़ा, वहीं मंदोदरी को अपने पति के अधर्म का फल सहना पड़ा। दोनों ही कथाएँ यह प्रश्न उठाती हैं कि युद्ध और सत्ता के महाआख्यानों में स्त्री का दुःख कितनी बार गौण कर दिया जाता है।
युद्ध की समाप्ति पर, जब सीता को राम के समक्ष लाया गया, राम ने वह वचन कहे जिसने युगों-युगों से विद्वानों और पाठकों को विचलित करता आ रहा है। राम ने सीता से कहा कि उन्होंने यह युद्ध अपने कुल की मर्यादा हेतु लड़ा है, और अब सीता स्वतंत्र हैं जहाँ चाहें जा सकती हैं, क्योंकि एक वर्ष तक शत्रु-गृह में रही स्त्री को स्वीकार करना उनके लिए दुष्कर है। यह वचन सीता के हृदय पर वज्रघात के समान था जिस पृति की प्रतीक्षा में उन्होंने अशोक वाटिका का प्रत्येक दिन काटा था, उसी के मुख से यह संशय सुनना असहनीय था।
सीता ने गहरी वेदना किन्तु अद्भुत आत्म सम्मान के साथ उत्तर दिया उन्होंने राम को स्मरण कराया कि उनकी शुचिता उनके हृदय में है, किसी पुरुष के प्रमाण पत्र में नहीं। तत्पश्चात् सीता ने लक्ष्मण को चिता प्रज्वलित करने का आदेश दिया, और अग्नि में प्रवेश कर गईं। यह उनके आत्म सम्मान की पराकाष्ठा थी, यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं कि वे शुद्ध हैं, अपितु यह उद्घोष कि सत्य को अग्नि भी स्पर्श नहीं कर सकती। अग्निदेव स्वयं सीता को हाथ पकड़कर अक्षत, अदग्ध बाहर लाए, और घोषणा की कि वैदेही सर्वथा निष्कलंक हैं।
इस प्रसंग पर नारीवादी और आधुनिक दृष्टिकोण से गम्भीर प्रश्न उठाए गए हैं हैं। केवल स्त्री को अपनी शुचिता प्रमाणित करनी पड़ी, पुरुष को क्यों नहीं? सीतायण की दृष्टि इस असंगति को स्वीकार करती है, और इसे युग सापेक्ष सामाजिक अपेक्षा के दबाव के रूप में पढ़ती है, न कि राम के व्यक्तिगत संशय के रूप में। भवभूति के उत्तररामचरित में राम के आंतरिक द्वंद और पश्चाताप को इसी असंगति की स्वीकृति के रूप में चित्रित किया गया है। राम स्वयं इस निर्णय के बोझ से आजीवन ग्रस्त रहे।
अग्निपरीक्षा के पश्चात् राम ने सीता को स्वीकार किया, और चौदह वर्ष पूर्ण होने पर तीनों अयोध्या लौटे, जहाँ भरत ने उनका भावपूर्ण स्वागत किया। राम का भव्य राज्याभिषेक हुआ, सीता के साथ यह राम-राज्य की स्थापना का ऐतिहासिक क्षण था, जिसे भारतीय स्मृति में आदर्श शासन के पर्याय के रूप में सदैव स्मरण किया गया। गहराई से देखें तो सीता स्वयं यह परीक्षा किसी बाध्यता से नहीं, अपितु अपनी शर्तों पर स्वीकार करती हैं वे स्वयं लक्ष्मण को चिता प्रज्वलित करने का आदेश देती हैं, प्रतीक्षा नहीं करतीं।
यह प्रमाण देने की नहीं, अपितु अपने सत्य की सार्वभौमिक उद्घोषणा की क्रिया है। अद्भुत रामायण की छाया सीता परम्परा के अनुसार तो वास्तविक सीता पहले से ही अग्नि में सुरक्षित थीं, और यह परीक्षा वस्तुतः छाया सीता का दहन और वास्तविक सीता का पुनः प्राकट्य था यह परम्परा घटना को एक भिन्न, अधिक रहस्यमय आयाम देती है, यद्यपि इसे वाल्मीकि परम्परा से पृथक् रखा जाना चाहिए। अयोध्या लौटकर स्थापित राम राज्य भारतीय राजनीतिक चिंतन में आदर्श शासन का चिरंतन मानक बना जहाँ प्रजा सुखी थी, न्याय निष्पक्ष था, और स्वयं राजा प्रजा कल्याण हेतु अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग करने को सदैव प्रस्तुत रहते थे।
राम ने सीता के सम्मान के लिये नहीं, अपने कुल की मर्यादा के लिये रावण से युद्ध किया- सीतायण से
October 09, 2026
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