बस्ती की रामलीलाः लंका मे पहुचे हनुमान
Hanuman reaches Lanka in Basti's Ramlila
बस्ती, 12 नवम्बर। सनातन धर्म संस्था द्वारा आयोजित श्री रामलीला महोत्सव के सप्तम दिवस के मंचन का शुभारंभ भगवान श्री राम जी, लक्ष्मण ही व हनुमानजी के के दिव्य भाव झांकी के समक्ष आरती के साथ प्रारंभ हुई। श्रीरामलीला के मंच पर उत्तरभारत के बड़े विद्वान जगद्गुरु, श्रीवैष्णवाचार्य, स्वामी वासुदेवाचार्य विद्या भास्कर जी महाराज का आगमन हुआ।
सनातन धर्म संस्था द्वारा उनका विधिवत स्वागत और सम्मान किया गया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि बालि वध के प्रसंग में बालि द्वारा यह पूछने पर की आपने मुझे क्यों मारा भगवान ने कहा कि इस पूरी पृथ्वी पर इच्छवाकु वंश का राज है तुम हमारी पृथ्वी के वासी हो और हमारी पृथ्वी पर रहकर तुम अपराध कर रहे थे तो तुम्हे विधि के अनुसार दण्ड देना मेरा कर्तव्य था। स्वामी वासुदेवाचार्य जी ने कहा कि यह पृथ्वी सनातनी जनों की है क्योंकि इस पृथ्वी का उद्धार और संरक्षण हमारे देवी देवताओं और पूर्वजों ने किया है।
उन्होंने कहा कि आप सब बड़े भाग्यशाली है कि आप अपने सामने अपने बच्चो को श्री राम और श्री सीता जी आदि के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने श्री रामलीला के महत्व पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म संस्था जो कार्य रही है उसका परिणाम बड़ा ही सुंदर दिखता है एक समय ऐसा आएगा जब हर बच्चे में रामत्व स्थापित हो जायेगा तब रावण स्वतः समाप्त हो जायेगा।
आरती में मुख्य रूप से दिग्विजय मिश्र, गोविंद चौधरी, रमेश सिंह, धर्मेंद्र जायसवाल, डॉ कैप्टन पुष्पलता मिश्रा, पूर्णिमा तिवारी, लता सिंह, प्रेम शंकर ओझा, अनुराग त्रिपाठी, रमेश सिंह, मनीष सिंह, श्याम जी चौधरी, डॉ अश्विनी सिंह, गणेश शंकर मिश्र, डॉ शैलष सिंह, अनुभव मिश्र, अशोक श्रीवास्तव, अतुल चित्रगुप्त अनुराग शुक्ल, राजेश मिश्र सहित दोनो विद्यालय परिवार के शिक्षक शिक्षिकाएँ सम्मिलित हुई।
सप्तम दिवस की लीला प्रथम दृश्य इस बात का परिचायक था कि राजपद मिल जाने से किसके अंदर मद नही आ जाता है। यह लीला यह सीख देती है कि राजमद विनाश कारण बन सकता है। रघुवर प्रसाद जायसवाल इंटर कॉलेज तेतरी बाजार सिद्धार्थनगर के बच्चों ने पहले प्रसंग में दिखाया की सुग्रीव राज्य संचालन में अपनी प्रतिज्ञा को विस्मृत कर देते हैं तब बजरंग बली सुग्रीव को दिए वचन की सुधि दिलाकर वानरी सेना एकत्र करने का कार्य करते हैं। वानरी सेना एकत्र होती है और वे सभी दिशाओं में माता सीता की खोज में निकल पड़ते हैं।
उसके बाद आगे की यात्रा में उनकी भेंट स्वयंप्रभा से होती है जहां सब बंदर भालू जल पीकर प्यास बुझाते और फल खाते हैं।
हनुमानजी को समुद्र किनारे जटायु के भाई सम्पाती मिलते हैं वानरी सेना द्वारा जटायु की चर्चा सुन विह्वल हो जाते हैं और अपनी दिव्य दृष्टि से माता सीता का पता बताते हैं। इस प्रकार समुद्र तट पर ही जामवंत जी द्वारा हनुमानजी के बल का उन्हें याद दिलाया जाता है। ब्लूमिंग बड्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल के बच्चों द्वारा की जा रही दूसरे भाग की लीला में अशोक वाटिका में प्रसंग, लंका दहन, हनुमान जी तक कि लीला का मंचन किया गया।
हनुमान जी अपने साथी वानरों से कहते हैं कि जब तक मैं सीता माता की सुधि लेकर वापस न लौटूं तब तक तुम लोग मेरी प्रतीक्षा कंदमूल फल खाकर करना ऐसा कहकर जय श्री राम की घोर गर्जना करते हनुमान तीव्र छलांग लगते हैं और लंका की ओर चल देते हैं समुद्र के कहने पर मैनाक पर्वत हनुमान जी की सहायता करने के लिए ऊपर आते हैं हनुमान जी ने मैनाक पर्वत को अपने पैरों से छुए और फिर प्रणाम करके कहा है मैं प्रभु श्री रामचंद्र जी का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहा मार्ग में सांपों की माता सुरसा बजरंगबली के बल बुद्धि विवेक का परीक्षण करने के लिए उनके भक्षण का आग्रह करती हैं।
बजरंगबली उनके मुख में प्रवेश करते हैं और छोटा रूप धारण कर बाहर निकल आते हैं तत्पश्चात सुरसा अपने आने का प्रयोजन बताती हैं और आशीर्वाद के साथ बजरंगबली को आगे की ओर प्रस्थान करने की अनुमति प्रदान करती हैं इसी प्रकार मार्ग में सिंहिका नाम की राक्षसी जो समुद्र में परछाई को पड़कर उनका भाषण करती है हनुमान जी की परछाई को पकड़ने पर उन्होंने वे उनका भी वध कर दिए और समुद्र पार कर लंका आ गए। पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचारि अति लघु रूप धरों निसि नगर करो पइसार।।
हनुमान जी नगर में रखवाली कर रहे सेवकों से बचते हुए एक मच्छर के समान छोटा रूप धारण कर लंका में प्रवेश करते हैं किंतु इस समय लंका के द्वार पर पहरेदारी देने वाली राक्षसी लंकनी से उनकी भेंट होती है। लंका में खोजते खोजते उन्हें विभीषण जी के घर का दिव्य भव्य स्वरूप दिखाई पड़ा जहां राम-राम का उच्चारण किया जा रहा था हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर विभीषण का परिचय प्राप्त किया। विभीषण माता जानकी के हरण के कारण की व्याख्या कर माता जानकी का पता बतलाते हैं जो अशोक वृक्ष के नीचे निवास कर रहीं है। कपि करि हृदय बिचार दीन्ही मुद्रिका डारि तब। जनु अशोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।
हनुमान जी ने सीता हनुमान जी ने सीता जी के समक्ष वह अंगूठी पर की जो प्रभु ने निशानी के तौर पर उनको दी थी सीता जी उसको पकड़ अत्यंत हर्षित हो जाती हैं तब हनुमान जी माता जानकी के समक्ष आते हैं और अपना परिचय बताते हैं और माता सीता को आश्वस्त करते हैं कि शीघ्र ही प्रभु लंका पर विजय प्राप्त कर आपको वापस लेकर जाएंगे माता को शंका होती है कि छोटे-छोटे बंदर किस प्रकार इस आता ताई पर विजय प्राप्त करेंगे तब हनुमान जी ने अपना विशाल शरीर प्रकट किया जिससे मां सीता के हृदय में विश्वास उत्पन्न हो गया फिर बजरंगबली ने माता से अनुमति मांगी की मां मुझे बहुत भूख लगी है मैं।
इस वाटिका में उपलब्ध फलों का भक्षण करूंगा और माता की अनुमति प्राप्त कर अशोक वाटिका में उपलब्ध फलों का सेवन कर अशोक वाटिका को पूरी तहस-नहस कर देते हैं उनके यहां का जम्मू माली मारा जाता है रावण को सूचना मिलती है रावण अक्षय कुमार को भेजते हैं जिनका बजरंगबली वध कर देते हैं तत्पश्चात मेघनाथ जाते हैं और ब्रह्मास्त्र का संधान कर बजरंगबली को बंदी बना लाते हैं रावण बजरंगबली के वचनों का उपहास उड़ाते हुए कहता है तेरी मृत्यु निकट आ गई है विभीषण बीच में रोकते हुए कहते हैं हे नाथ दूत को मारना कतई उचित नहीं है।
तब रावण बजरंगबली की पूंछ पर कपड़ा लपेटकर आग लगाने की आज्ञा देते हैं आज्ञा पाते ही राक्षस ऐसा करते हैं बजरंगबली वहां से बंधनों से मुक्त होकर लंका में दौड़ दौड़ कर महलों पर चढ़कर उनमें चारों ओर आग लगा देते हैं पूरी सोने की लंका धू धू कर जलने लगती है। बजरंग बली की जय के जयघोष से पूरा पांडाल गूँज गया। तत्पश्चात माता जानकी से आज्ञा लेकर हनुमान जी लंका से प्रस्थान करते हैं और समुद्र पार कर सभी बंदरो से मिलते हैं वह महाराज सुग्रीव से मिलकर माता सीता का कुशल छेम बतलाते हैं भगवान वानर सेना सहित लंका की ओर प्रस्थान करते हैं इस प्रकार यही पर कल की लीला का विश्राम होता है।











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