Strong Women को ‘Difficult’ क्यों कहा जाता है?
Nihharika की नज़र
जब कोई पुरुष अपने विचार स्पष्ट रखता है, उसे “confident” कहा जाता है।
जब वही काम कोई महिला करती है, तो उसे अक्सर “difficult” का टैग दे दिया जाता है।
यह फर्क केवल शब्दों का नहीं है; यह मानसिकता का आईना है।
समाज में “Strong Woman” की परिभाषा अभी भी पूरी तरह स्वीकार नहीं की गई है। हम महिलाओं की सफलता का जश्न तो मनाते हैं, लेकिन उनकी स्पष्टता, असहमति और स्वतंत्र निर्णयों से असहज हो जाते हैं। यही असहजता उन्हें “कठिन” या “मुश्किल” घोषित कर देती है।
स्पष्टता से असहज समाज
एक मजबूत महिला की सबसे बड़ी पहचान क्या है?
वह अपनी बात कहती है।
वह “ना” कहने से नहीं डरती।
वह निर्णय लेती है—और उसकी ज़िम्मेदारी भी उठाती है।
लेकिन यही गुण अक्सर उसके खिलाफ इस्तेमाल किए जाते हैं।
उसे कहा जाता है—
“बहुत attitude है।”
“Adjust नहीं कर पाती।”
“बहुत ambitious है।”
यहाँ सवाल यह नहीं कि वह कैसी है।
सवाल यह है कि समाज किस तरह की महिला को सहज मानता है।
सुविधा के अनुसार बनी स्त्री-छवि
सदियों से स्त्री की एक आदर्श छवि बनाई गई—
संकोची, सहनशील, समझौता करने वाली, और दूसरों को प्राथमिकता देने वाली।
जो महिला इस साँचे में फिट बैठती है, वह “अच्छी” कहलाती है।
जो इस ढाँचे को चुनौती देती है, वह “Difficult” घोषित हो जाती है।
दरअसल, “difficult” शब्द अक्सर उस महिला के लिए इस्तेमाल होता है
जो दूसरों की सुविधा से ज़्यादा अपने आत्मसम्मान को महत्व देती है।
कार्यस्थल पर दोहरे मापदंड
कार्यालयों में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट दिखाई देती है।
एक पुरुष यदि सख्त निर्णय ले, तो उसे “decisive leader” कहा जाता है।
एक महिला वही निर्णय ले, तो कहा जाता है—
“Hard to work with.”
महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे कुशल भी हों और सहज भी,
नेतृत्व भी करें और भावनात्मक रूप से नरम भी रहें,
दृढ़ भी हों और विनम्रता की परिभाषा में फिट भी बैठें।
यह दोहरा दबाव ही उन्हें हर कदम पर साबित करने को मजबूर करता है कि वे “बहुत ज़्यादा” नहीं हैं।
महत्वाकांक्षा का अपराध
जब कोई महिला खुले तौर पर अपनी महत्वाकांक्षा व्यक्त करती है,
तो उसे अक्सर अस्वाभाविक समझा जाता है।
समाज अब भी यह मानने को पूरी तरह तैयार नहीं कि
महिलाएँ भी शक्ति, पद और प्रभाव चाह सकती हैं—
और यह चाहत स्वाभाविक है।
महत्वाकांक्षा को पुरुषों में गुण माना जाता है,
लेकिन महिलाओं में वही गुण कई बार असहजता पैदा करता है।
यही असहजता उन्हें “दifficult” बना देती है।
असहमति का अधिकार
एक और महत्वपूर्ण कारण है—असहमति।
जो महिला हर बात पर सिर नहीं हिलाती,
जो प्रश्न पूछती है,
जो तर्क देती है,
वह “कठिन” घोषित कर दी जाती है।
पर क्या असहमति लोकतंत्र की आत्मा नहीं है?
क्या सवाल पूछना परिपक्वता का संकेत नहीं है?
फिर महिला का सवाल असुविधा क्यों बन जाता है?
“Difficult” या “Independent”?
शायद समस्या यह नहीं कि महिलाएँ कठिन हैं।
समस्या यह है कि वे अब निर्भर नहीं हैं।
आर्थिक आत्मनिर्भरता, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता ने महिलाओं को
निर्णय लेने की शक्ति दी है।
और शक्ति हमेशा स्थापित ढाँचों को असहज करती है।
जब कोई महिला अपने लिए सीमा तय करती है,
जब वह गलत व्यवहार को स्वीकार नहीं करती,
जब वह समझौते की सीमा स्पष्ट कर देती है—
तो वह कुछ लोगों के लिए “कठिन” बन जाती है।
टैग बदलने की ज़रूरत
समय आ गया है कि हम शब्दों की परिभाषा बदलें।
“Difficult” को नकारात्मक अर्थ में देखने की बजाय,
हमें यह पूछना चाहिए—
क्या वह महिला सिर्फ़ अपने मूल्यों पर अडिग है?
हर वह महिला जो स्पष्ट है,
जो सीमाएँ तय करती है,
जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती है—
उसे कठोर नहीं, सक्षम कहा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
शायद “Strong Women” को “Difficult” इसलिए कहा जाता है
क्योंकि वे सुविधाजनक नहीं होतीं।
वे सवाल करती हैं,
सीमाएँ तय करती हैं,
और अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी लेती हैं।
लेकिन इतिहास गवाह है—
परिवर्तन हमेशा उन्हीं लोगों ने किया है
जिन्हें अपने समय में “मुश्किल” कहा गया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि
हम महिलाओं को बदलने की कोशिश करने के बजाय
अपनी सोच को बदलें।
क्योंकि सच यह है—
मजबूत महिलाएँ कठिन नहीं होतीं,
वे स्पष्ट होती हैं।
और स्पष्टता से डरना नहीं,
उसे स्वीकार करना सीखना चाहिए।
✍️ — Nihharika
















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