पांच साल पूरे वादे रह गये अधूरे- अक्षरा सिंह
(लखीमपुर-खीरी) हर पांच साल बाद देश की राजनीति फिर उसी मोड़ पर आकर खड़ी हो जाती है, जहां नेताओं के भाषण में चुनाव प्रचार के दौरान जनता ही सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं। सड़कों पर बड़ी-बड़ी रैलियां, मंचों पर बड़े-बड़े व कभी न पूरे होने वाले वादे किए जाते हैं। ऐसा लगता है कि मानो देश की हर समस्या का समाधान चुनाव तक ही सीमित था।
चुनाव आते ही बेरोज़गार युवाओं को रोजगार की किरण, गरीबों को राहत की उम्मीदें व किसानों को उसकी मेहनत का दर्द, यह सब नेताओं के भाषण में शामिल हो जाता है। इसके साथ ही विकसित भारत के जो नए सपने दिखाए जाते हैं, असल में आगे चलकर उसकी सच्चाई भी कुछ और दिखाई पड़ती है। जैसे ही चुनावी शोर थमता है, वही जनता अपनी अधूरी उम्मीदें व ज़रूरतों को लेकर अब अगले पांच सालों तक टूटे हुए वादों के बीच पिस कर रह जाती है।
बड़ा सवाल यह नहीं है कि ये नेता बड़े-बड़े झूठे वादे क्यों करते हैं?बल्कि मूल सवाल तो यह है कि आखिर क्यों जनता हर बार उन्हीं झूठी और टूटी हुई उम्मीदों का शिकार बन जाती है? क्या शायद इसलिए कि आम आदमी के पास उम्मीद के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है? लोकतांत्रिक देश में जनता, वोट देने वाली भीड़ का हिस्सा मात्र बनकर रह जाए इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी? हालांकि आज के दौर में लोकतंत्र का अर्थ चुनाव परिणाम तक सिमटने का ही नहीं बल्कि जनता और सरकार के बीच एक दूसरे के प्रति पारदर्शिता व जवाबदेही से होनी चाहिए।
साथ ही आम जन मानस को भी अब तालियां बजाने व रैलियों में बह जाने के बजाए नेताओं से अपने हक के गंभीर सवाल पूछने होंगे। जब तक जनता अपने अधिकारों व जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक हर पांच साल बाद चुनाव तो आयेगे लेकिन बदलाव की उम्मीदें नहीं होंगी व हर बार की तरह जनता मतदाता मात्र बनकर ही रह जाएगी। हालांकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त जनता ही होती है, लेकिन जब उसी जनता की उम्मीदों के साथ बार-बार खिलवाड़ होता है, उसकी उम्मीदों को तोड़ा जाता है तो यह परिस्थिति न केवल एक व्यक्ति की, बल्कि पूरे लोकतंत्र की असफलता बनकर रह जाती है।












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