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इतना आसान नही है बस्ती को स्पेस तक ले जाना....

इतना आसान नही है बस्ती को स्पेस तक ले जाना....
अशोक श्रीवास्तव की समीक्षाः मनीष मिश्रा बस्ती की जनता और कुछ पत्रकारों के मसीहा बन चुके हैं। हफ्ता दस दिन पर लाव लश्कर के साथ आना, सिलाई मशीन, साड़ी, मोबाइल, नौकरी देने के बहाने हजारों की भीड़ जुटाना उनके लिये सामान्य सी बात है। जहां पुलिस सामान्य व्यक्ति द्वारा आयोजित 100 या 200 गैदरिंग वाले छोटे कार्यक्रमों मे पहुंचकर अक्सर डंडा पटकती है वहां कभी इनसे नही पूछा जाता कि इतने बड़े कार्यक्रम की अनुमति ली गई है या नहीं।


भगवान न करे किसी दिन कुछ हो और मनीष विवादों मे आ जायें। वैसे महिलायें इनसे ज्यादा प्रभावित हैं। दीदी दीदी कहकर वे जनपद की महलाओं से कनेक्ट हो चुके हैं, सभी का कुशलक्षेम पूछते हैं और कभी कभार उनके घर भी पहुंचते हैं। कोई समझे या न समझे ये पूरी कवायद राजनीति से जुड़ी दिखती है और किसी ने इनको प्रोजेक्ट किया है। फिलहाल ये कोई नई बात नही है। बॉलीवुड हो या राजनीति, आये दिन कोई न कोई किसी न किसी को प्रोजेक्ट करता है। लेकिन मनीष के उद्देश्य और लोगों जैसे नहीं हैं। वे बस्ती को सीधे बेस से स्पेस तक ले जाना चाहते हैं। इसके लिये वे युवाओं को रोजगार दे रहे हैं, बीमारों का इलाज करवा रहे हैं और आधी आबादी को खुश करने के लिये साड़ियां और सिलाई मशीन बांट रहे हैं।


उनके आवाह्न पर जुटने वाली भीड़ से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज भी एक साड़ी पर अपना बेशकीमती चार पांच घण्टे बरबाद करने वाली महिलायें हैं। जरा सोचिये एक साड़ी देकर कोई आपका भविष्य बदल सकता है, क्या सिलाई मशीन से आपके अच्छे दिन आ जायेंगे, या फिर 8 से 10 हजार की नौकरी गैर प्रान्त या किसी बड़े शहर मे दिलाकर किसी परिवार मे खुशहाली लाई जा सकती है। कतई नहीं। यह केवल और केवल इमोशनल ब्लैकमेलिंग का जरिया बन सकता है। फिलहाल वैचारिक दरिद्रता का दौर चल रहा है, जनता ऐसे ही लोगों को अपना भगवान और मुकद्दर मान लेती हैं। बस्ती को बेस से स्पेस पर ले जाने वाली थीम, मनीष की है। अगर कभी बस्ती स्पेस पर गया तो इसका सारा श्रेय मनीष को ही जायेगा।


हमारा मानना है कि देश की आजादी के बाद बहुत से सांसद और विधायक हुये, चुनाव जीता पांच साल बिताया, कोई जनता के बीच बना रहा तो कोई बिलकुल डिस्कनेक्ट रहा। भोली भाली जनता इमोशनल ब्लैकमेलिंग का शिकार होती रही। आजादी के 80 साल बाद भी बस्ती जनपद की पहचान एक गांव की है। करीब चार दशक हो गये, बस्ती मे कोई आवासीय यांजना नहीं आई, उद्योंगहीनता पर किसी ने काम नही किया। स्कूल बंद होते जा रहे हैं, अपराध और आत्महत्या के आंकड़े रिकार्ड बना रहे हैं। पत्रकार दो सौ पांच सौ बख्शीश पाने के लिये घण्टों किसी कार्यक्रम मे बैठे रहते हैं, यहां तक कि बिना बुलाये पहुंच जाते हैं और आयोजक को लिस्ट थमा देते हैं कि हम 20 या 25 की संख्या मे हैं, जरा देख लीजियेगा। 


सवाल ये भी है कि बस्ती मे कितने कोचिंग सेन्टर हैं जो आईएएस, पीसीएस और आईपीएस या नीट की तैयारी कराते हैं। हां ऐसे अनेक डिग्री कालेज जरूर हैं जहां छात्र छात्रायें परीक्षा के एक दिन पहले फार्म भरकर पास हो जाती हैं। ग्रेजुएट युवा को सीधे एक एप्लीकेशन लिखने का सलीका नही मालूम है। बस्ती के किसी चौराहे पर ट्राफिक कन्ट्रोल के लिये सिग्नल नही है। सरकारी अस्पताल तो मरीजों को रेफर करने का जरिया बन गये हैं। दस पन्द्रह साल से मांग हो रही है, बस्ती मे हार्ट और न्यूरो का डाक्टर नही है। एक बड़े नेता इसकी मांग प्रमुखता से कर रहे थे, वो भाजपा मे चले गये, मांग ही खत्म हो गई। हां एक काम बड़ी मजबूती से हुआ है, जनता से टैक्स वसूलने का।


बस्ती जिले का क्षेत्रफल सीमित है। यह टाउन एरिया से नगरपालिका बना, फिर जिला पंचायत बना, इसके बाद कमिश्नरी बना और अब विकास प्राधिकरण बन गया। एक इंच जमीन नही बढ़ी। कही ंकोई कामर्शियल काम्प्लेक्स नहीं बना, सीवर आज तक नसीब नही हुआ। यह बस्ती प्राधिकारण और सरकार की अूदरदर्शिता का ही नतीजा है कि अवैध बिल्डर यहां कुकुरमुत्तों की तरह बढ़े हैं। 8 गुणे 10 के कमरे का आवंटन जिला पंचायत 8 लाख रूपये मे कर रहा है। नगरपालिका ने लोहे की टंकियां कितने मे बेंची है यह भी सभी को पता है। डूब क्षेत्र मे धड़ल्ले से निर्माण हो रहा है, आवासीय निर्माण ही नही स्कूल भी संचालित हो रहे हैं। बांस बल्लियों के सहारे आज भी मोहल्लों मे बिजली आपूर्ति की जा रही है। जितनी इकाइयां हुईं सभी का एक काम, जनता से टैक्स वसूलना। सुविधाओं की मांग करने पर नेताओं को सांप सूंघ जाता है।


बस्ती की जनता कितनी भोली भाली है और यहां के नेता कितने प्रभावशाली, इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं। पिछले कई सालों से जनता एक ही जिले मे दो टोल टैक्स झेल रही है। बारी बारी से सभी ने अपनी ताकत की आजमाइश की है, मजाल क्या कोई टोल प्लाजा का एक पाया भी खिसका पाया हो, हटाने की बात तो बहुत दूर है। स्कूलों मे खटारा बसें बच्चों को ढो रही हैं। अनेक बसों में मासूम बच्चे खड़े होकर स्कूल आते हैं। एथेनाल से गाड़िया चौपट हो रही हैं। प्रतिबन्धित पालीथीन हमारी सांसें छीन रहा है। पुलिस थानों मे न्याय न मिलने और अदालतों में लम्बी अवधि तक मुकदमे चलने, कर्ज के बोझ से दबे होने के कारण लोग सुसाइड कर रहे हैं।


मनीष जी अगर बस्ती को स्पेस तक ले जाना चाहते हैं तो 10 मामलों को चिन्हित करिये, उनके परिजनों और गांव वालों से मिलिये और कारण पता करिये लोग सुसाइड क्यों कर रहे हैं। एक भी आदमी को आप डिप्रेशन से बाहर निकाल पायेंगे तो यह आपकी बहुत बड़ी कामयाबी होगी सारे रास्ते बंद हो जाते हैं तब लोग सुसाइड करते हैं, हालांकि यह किसी भी समस्या का हल नही है। बस्ती को स्पेस तक ले जाने के लिये बस्ती की जनता का दर्द समझना होगा। डाक्टर इलाज से पहले बीमारी को डाइग्नोस करता है। आपने तो बिना डाइग्नोस किये मरीजों का इलाज शुरू कर दिया। क्या आपने पता कर लिया है कि बस्ती की जनता की बीमारी का इलाज एक साड़ी, सिलाई मशीन नही है।


पुलिस थानो मे पूरी निष्पक्षता से मामलों की सुनवाई हो, अदालतों मे मामलों का समयबद्ध निस्तारण हो, शहर मे धड़ल्ले से कामर्शियल और आवासीय भवनों के निर्माण हों, उचित दर और आसान प्रक्रिया से इसका आवंटन किया जाये, अवैध टोल प्लाजा से राहत मिले, स्कूल कालेजों में कक्षायें नियमित चलें। रिक्तियां भरी जायें, सड़कों पर ट्राफिक सिग्नल और जेब्रा क्रांसिग हो, अस्पतालों मे हर बीमारी के डाक्टर हों, युवाओं के लिये मोटीवेशनल क्लास संचालित किये जायें, गली मोहल्ले से बांस बल्ली हटाकर विद्युत पोल से आपूर्ति की जाये, राशन कार्ड, वोटर कार्ड, आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, श्रमकार्ड आसानी से बने और संशोधित हो, अफसरों की मनमानी और घूसखोरी कम हो, जनसुनवाई और समाधान दिवसों को सार्थक बनाया जाये, समाधान दिवसों मे जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहें, गांव मे अदालतें लगें, नगदी फसलों को बढ़ावा मिले, गांव के चौराहों पर बाजार लगे, गांव से शहर तक खेलकूद को बढ़ावा दिया जाये तो बस्ती स्पेस तक जा सकता है।


साड़ी, सिलाई मशीन, साइकिल, मोबाइल किसी को आत्मनिर्भर नही बना सकता। बस्ती स्पेस तक तभी जायेगा जब जिले की 60 फीसद जनता आत्मनिर्भर होगी। हर हाथ मे रोजगार होगा, बैंक आसानी से लोगों को ऋण देंगे, उन्हे अलग अलग व्यवसाय क्षेत्र का मार्गदर्शन और उत्पादों को बाजार मिलेगा। ब्राण्डिंग और प्रतिस्पर्धा ने छोटे व्यवसायों को खत्म कर दिया है। आनलाइन व्यापार से बाजारों की रौनक छिनती जा रही है। पहले लाख दो लाख की लागत से अच्छी दुकानें खुल जाती थीं, अब इतने से अच्छी चाय की दुकान भी नही खुलती है। कहां खड़े हैं, कौन सी परिस्थितियां हैं। इन सबका आंकलन करने के बाद ही स्पेस तक जाने का दावा करना चाहिये।


हां इसका शार्टकट भी है। 50 पत्रकारों की लिस्ट बनाइये, उनको एक एक हजार रूपया बख्शीश देकर, समय समय पर साइकिल, साड़ी, मोबाइल, सिलाई मशीन बांटने का इवेन्ट आर्गनाइज कर उनके द्वारा सोशल मीडिया पर बस्ती को स्पेस तक ले जाने वाले दावों का पोस्ट कराते रहिये। आजकल सोशल मीडिया का दौर है। इसके पास हमार आपके कन्टेन्ट की बदौलत ही दुनियां का सबसे बड़ा सर्च इंजन है, कुछ दिन बाद इसी सर्च इंजन से पूछियेगा कि बस्ती को स्पेस तक ले जाने का श्रेय किसका है, फटाक से जवाब मिलेगा मनीष मिश्रा का। इस तरह बस्ती स्पेस तक जा सकता है। 


पिछले चार दशक मे बस्ती मे दो जमीनी नेता हुये, एम जगदम्बिका पाल, दूसरा हरीश द्विवेदी। दोनो मे घमंड नही है, दोनो के पास सबकुछ होते हुये इन्होने बाहुबली के रूप मे अपनी पहचान नही बनाई। ये जब भी सत्ता और ताकत मे आये, आम आदमी के पीच अपनी पैठ बनाकर, सबसे पर्सनली कनेक्ट होकर आये। अच्छा होगा आप भी आम जनता से कनेक्ट होइये, उनका दर्द पूछिये, समस्याओं का समाधान कराइये, और लोगों को आत्मनिर्भर बनाइये। लग्जरी गाड़ियों में सायरन बजाते हुये चलने से यह संभव नही होगा। वरना आप जो कर रहे हैं वह ओनली इमोशनल ब्लैकमेलिंग कहा जाता है।

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