फर्जी DL जारी कर करोड़ों कमाये,
परत दर परत सामने आ रहा फर्जीवाड़ा, 4 पर एफआईआर
बस्ती, 02 सितम्बर। आरटीओ आफिस मे हुये फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद ड्राइविंग लाइसेंस धारकों तथा अधिकारियों व कर्मचारियों मे इस बात को लेकर भय व्याप्त हो गया है कि अगला निशाना कौन है और किसका डीएल रद होने वाला है। फिलहाल हमेशा की तरह इस बार भी कुछ लोग बलि का बकरा बनने वाले हैं और आलाकमान बेदाग।
अभी तक परिवहन आयुक्त के निर्देश पर फर्जी डीएल जारी किये जाने के मामले मे आरआई संजय कुमार दास को निलंबति किया जा चुका है और सीमा गौतम के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिये गये हैं। आउटसोर्सिंग पर कार्य कर रहे चार कर्मचारियों पंकज यादव, प्रवीण यादव, अभय पाण्डेय और सुफियान अहमद के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। यह बेहद हैरान करने वाला मामला है। आरटीओ, ए आरटी ओ की नाम के नीचे करोड़ों रूपये की अवैध वसूली हुई और उन्हे इसकी भनक तक नही लगी। कार्यवाही करने वाले या तो बहुत नादान हैं या फिर वे बड़ा शिकार नही करना चाहते।
आपको बता दें परिवहन विभाग में दलालों के सिंडिकेट ने तकनीक और नियमों की खामियों का फायदा बड़ी जालसाजी की। जानकारी मिली है कि इस पूरे घटनाक्रम की स्क्रिप्ट अरुणाचल प्रदेश के सेप्पा और सियांग जिलों में लिखी गई और पूरा खेल बस्ती आरटीओ ऑफ़िस में खेला गया। बैकलॉग एंट्री के नाम पर बिना किसी पूर्व रिकॉर्ड और लर्नर लाइसेंस के धड़ल्ले से परमानेन्ट ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए। 2013 से पहले जब लाइसेंस मैन्युअल बनते थे, उन्हें डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए बैकलॉग एंट्री की सुविधा दी गई थी।
सिंडिकेट ने इसी का फायदा उठाया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के जिलों से फर्जी मैनुअल रिकॉर्ड तैयार करवाए और फिर बस्ती आरटीओ में उसे एड्रेस चेंज या रिन्यूअल के लिए अप्लाई कर दिया। धांधली यह है कि आवेदकों के पास पुराना लाइसेंस होने का कोई पक्का प्रमाण नहीं था। जबकि पक्का लाइसेंस बनने से पहले लर्नर लाइसेंस अनिवार्य है, जिसकी अवधि 1 से 6 महीने की होती है. लेकिन, इस सिंडिकेट ने हजारों आवेदकों के बिना लर्नर लाइसेंस बनवाए सीधे परमानेंट डीएल जारी कर दिए।
यूपी 51 और यूपी 63 सीरीज के दर्जनों ऐसे लाइसेंस संदेह के घेरे में हैं। इस खुलासे के बाद अब सवाल यह है कि जब 2013 के बाद सारा रिकॉर्ड ऑनलाइन है तो दलालों को बैकलॉग की अनुमति कैसे मिली? क्या अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर का दुरुपयोग हुआ है या यह सब उनकी मौन सहमति से हुआ ? फिलहाल आरटीओ आफिस का फर्जीवाड़ा कोई नई बात नही है। ऐसा अनेकों बार हुआ है जब यहां फर्जीवाड़े को अंजाम देने वाला संगठित गिरोह सामने आया है लेकिन कार्यवाही के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई है। आरटीओ, एआरटीओ को इन सब फर्जीवाड़े की जिम्मेदारी लेनी चाहिये और पूरा सिस्टम रिफार्म करना चाहिये। वरना किरदार बदलते रहेंगे और फर्जीवाड़ा होता रहेगा।













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