आत्महत्या, सबसे बडी कायरता और निकम्मापन
अशोक श्रीवास्तव की समीक्षाः परीक्षा मे फेल हो जाओ, जहर खा लो, कर्ज के बोझ से दबे हो जहर खा लो, मां बाप, पति, पत्नी डांट लगा दें, जहर खा लो, पत्नी से झगड़ा हो जाये जहर खा लो, कथा न करा पाओ, जहर खा लो, प्रेमी या प्रेमिका साथ ना दे जहर खा लो, पत्नी मायके चली जाये जहर खा लो, बड़ा आसान है, लेकिन इससे बड़ी कायरता और निकम्मापन कुछ भी नही है। शर्म आती है ऐसे लोगों पर जो अपनी जीवनलीला खत्म कर अनंत संभावनाओं का अंत कर देते हैं। कायरों ने जिंदगी को मजाक बनाकर रखा है। ऐसे लोग न खुद के काम आ सकते हैं और न समाज के। अव्वल कहें तो आत्मघाती कदम उठाने वाला न परिवार का होता और न समाज का। उसे सिर्फ अपने लिये जीना होता है।
इसीलिये उद्देश्य नही पुरा हुआ तो खुद को खत्म कर लिया। आत्महत्या के तेजी से बढ़ते मामलों के लिये हमारा समाज, परिवार, अति महत्वाकांक्षा, और अपने देश का कानून काफी हद तक जिम्मेदार है। आत्मघाती कदम उठाने वाले के आश्रितों को नौकरी कतई नही मिलनी चाहिये और न ही परिवार को कोई मुआवजा, और न ही ऐसे व्यक्ति से कोई सहानुभूति रखनी चाहिये। आत्महत्या को पुलिस भी प्रायः ठंडे बस्ते मे डाल देती है। इसके पीछे का फैक्ट बहुत कम सामने आ पाता है।
आजकल पुलिस, जज, साधु संत, डाक्टर, वकील, पत्रकार, व्यापारी जैसे तबके के लोग आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। समाज के लिये इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नही हो सकता। जिसके ऊपर यह जिम्मेदारी है कि अवसादग्रस्त लोगों की काउंसिलिंग कर उसे आत्मघाती कदम उठाने से रोके, वही अपनी जान लेने पर आमादा है। आम तौर से लोग यह भूल जाते हैं कि उनके न होने का परिवार और समाज पर क्या फर्क पड़ेगा। यह वही सोच सकता है जो अपनी वैल्यू खुद नही समझता, और जो अपनी तथा इस खूबसूरत जिंदगी की कीमत समझ जायेगा वह कभी आत्मघाती कदम नही उठायेगा।
इसीलिये कहा जाता है कि अपनी कीमत समझो, तभी लोग तुम्हारी कीमत समझेंगे। जो खुद की कीमत नही आंक पायेगा वह हमेशा हाशिये पर रहेगा। जीवन अनमोल है, इसमे जितना रंग भरो उतनी रंगीन हो जाती है। बस्ती जनपद मे घटी तीन घटनाओं ने सभी को हिलाकर रख दिया। दो पुलिस इंसपेक्टरों ने जीवन से हार मानकर मौत को गले लगा लिया। एक लाश नदी मे मिली दूसरे की सरकारी कमरे मे फंदे से लटकती मिली। इनकी हरकतों से पूरा महकमा शर्मसार हुआ। अब पैंड़ा बाबा ने जहर पीकर सुसाइड करने की कोशिश की। इससे पहले करीब पांच मिनट का वीडियो जारी किया और तमाम बातें बताईं।
लेकिन पूरे वीडियो मे उनके द्वारा आत्मघाती कदम उठाये जाने की वजह साफ नही हुई। बुद्धिमान लोग यह अर्थ निकाल रहे हैं कि पैंड़ा बाबा ने बस्ती मे धीरेन्द्र शास्त्री की कथा कराने का संकल्प लिया था और वे इसमे सफल नही हुये। इससे हताश होकर उन्होने कायरता पूर्ण कदम उठाया। सोशल मीडिया पर सभी उनका धिक्कार रहे हैं। जानकारी मिली है कि बागेश्वरधाम के आचार्य धीरेन्द्र शास्त्री की कथा कराने के लिये वे पैदल यात्रा कर उनसे मिलने गये थे। उन्होने भरोसा भी दिलाया था कि बस्ती कथा करने आयेंगे। पैंड़ा बाबा अपना संकल्प पूरा करने के लिये लोगों से चंदा भी जुटा रहे थे।
इसी बीच बस्ती मे एक और बाबा का औतार हुआ। वे भी धीरेन्द्र शास्त्री से मिलने गये और उनसे वादा कराया कि बस्ती मे कथा करने आयेंगे। उनकी स्थिति पैंड़ा बाबा जैसी नही है। वे कथा का आयोजन कराने के लिये 10, 20, 50 रूपये के चंदे के मोहताज नही हैं। वे जो सोच लेते हैं जरूर करते हैं या फिर वह हो ही जाता है। जानकार बता दे रहे हैं कि नये वाले बाबा ने पैंड़ा वाले बाबा का सपना चुरा लिया। अब आप सोचिये, बागेश्वरधाम वाले बाबा किसके बुलाने से आयेंगे, पैड़ा वाले बाबा के या फिर हाल ही मे औतार लेने वाले बाबा के। फिलहाल पैंड़ा वाले बाबा टूटे और और टूटते चले गये। अंत मे खौफनाक कदम उठा लिया।
इसी तरह दरोगा ने भी कायरता की थी। एक आवारा औरत के चक्कर मे पड़कर ब्लैकमेल होते रहे और जब सोचा कि अब एक्सपोज हो जायेंगे, अपना जीवन ही खत्म कर लिया। वे आये दिन ऐसी साजिशों का भंडाफोड़ करते थे, अपने मामले मे इतना क्यों टूट गये। बेहतर होता उस साजिशकर्ता महिला को एक्सपोज करते, उसका सच सामने लाते, हजारों लोग की जिंदगियां बंच जातीं। आम आदमियों और जाहिलों की तरह उन्होने भी जिंदगी के महत्व को कमतर आंका और द एण्ड कर लिया। पैंड़ा वाले बाबा हों, दरोगा हों या फिर हाल ही मे आत्महत्या करने वाले जज, ये समाज को क्या संदेश देंगे।
ऐसे लोगों की कायरता यही संदेश देती है कि हर समस्या का समाधान यही शार्टकट है। इन्हे प्रोत्साहन देना इनके प्रति सहानुभूति रखना सामाजिक आप है। इसलिये आदत और सोच बदलिये और जिस रूप मे ऐसी घटनाओं को हतोत्साहित कर पायें करते रहें। झाड़ फूंक कर शोहरत कमाने वाले पैडा़ वाले बाबा को संयम पूर्वक तप करना चाहिए था। प्रसिद्धि और रातों रात धनाढ्य बनने की चाहत किसी साधु संत की नही होनी चाहिये। पैंड़ा वाले बाबा करीब डेढ़ साल पहले प्रगट हुये। कुछ मीडिया संस्थानों को बख्शीश देकर सोशल मीडिया मे छाये रहे। सुर्खियों में बने रहने के लिए कभी गाड़ी में आगजनी, कभी स्वयं पर हमला और विषपान, वह भी फेसबुक पर लाइव। लानत है ऐसे कृत्य पर।
मीडिया संस्थान भी कम दोषी नही हैं। पैंड़ा वाले बाबा का जvkRegR;kहर निगलता वीडियो वायरल कर खूब वाहवाही और टीआरपी बटोरा। किसी ने एक बार भी नही सोचा कि ऐसा वीडियो वायरल करना कहां तक उचित है। क्या जानकर इसे वायरल किया गया। यह कि जो लोग देखेंगे वह ऐसा कदम नही उठायेंगे, या फिर जो अपनी जिंदगी खतम करना चाहते हैं उन्हे तरीका बताने के लिये वायरल किया। ऐसी नासमझ पत्रकारिता को यहीं विराम देना चाहिये। इतना ही नही अपने सोशल मीडिया पोस्ट और समीक्षा से अक्सर हम सवाल उठाते हैं कि पेड़ और कुंडी से लटकती लाशों का भी वीडियो और फोटो वायरल नही होना चाहिये।
इससे समाज पर नकारात्मक असर पड़ता है। पुलिस व प्रशासनिक अफसरों को एक ऐसी एडवाइजरी जारी करनी चाहिये जिसमे फांसी से लटकती लाशों और आत्मघाती कृत्य के लाइव फोटो वीडियो वायरल करने पर पूरी तरह की पाबंदी हो। अफसोस ये है कि बीएनएस मे आत्महत्या के प्रयास या आत्महत्या को आपराधिक कृत्य नही माना जा रहा है। वरना आत्महत्या का प्रयास करने वाले को एक साल की जेल व जुर्माने की सजा मिलती थी। संभव है कि इस वजह से ऐसे मामलों मे बेतहाशा वृद्धि हो रही है। सरकार और सरकार के प्रतिनिधियों तथा इनके संयोग से बने सिस्टम को इस विषय पर गंभीरता से सोचना होगा वरना देश की जनसंख्या नियंत्रित करने के लिये नसबंदी और परिवार नियोजन लागू करने की जरूरत नही पड़ेगी, बढ़ते हुये अरंकड़ों को देखने पर पता चलता है कि आधी आबादी आत्महत्या से खत्म हो जायेगी।
आत्महत्या, सबसे बडी कायरता और निकम्मापन
October 25, 2026
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