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BASTI. काकश कायम रहा, प्रेस क्लब चुनाव 2025 में आंशिक बदलाव के साथ पुरानी कार्यकारिणी बहाल

BASTI. काकश कायम रहा, प्रेस क्लब चुनाव 2025 में आंशिक बदलाव के साथ पुरानी कार्यकारिणी बहाल

बस्ती, 16 सितम्बर। प्रेस कलब का चुनाव काफी रोचक रहा। चुनावी प्रक्रिया शुरू होते ही सोशल मीडिया पर किये गये दावे मंगलवार को परिणाम आने पर सच साबित हुये और प्रेस क्लब पर कई दशक से कुंडली मारकर बैठे प्रत्याशियों का वर्चस्व कायम रहा। दारू, रूपये पर बिकने वाले वोटरों और फियादीन की भूमिका निभाने वाले चापलूस टाइप के पत्रकारों ने बहुत मामूली बदलाव के साथ पुनः 2022 की कार्यकारिणी का चयन किया। 



सारी बुद्धिमता, साफ सुथरे, निर्विवाद व्यक्तित्व के लोग हाशिये पर रह गये। प्रेस क्लब में ऐसे लोग न घुसने पाये इसके लिये बनाये गई अभेद्य दीवार का अस्तित्व कायम रहा। विनोद कुमार उपाध्याय लोकप्रियता के रिकार्ड कायम करते हुये एक बार फिर अध्यक्ष निर्वाचित हुये हैं। उनकी लोकप्रियता प्रधानमंत्री जैसी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे लगातार चैथी बार प्रेस क्लब अध्यक्ष चुने गये। नई कार्यकारिणी में प्रकाश चन्द्र गुप्ता संरक्षक, विनोद कुमार उपाध्याय अध्यक्ष, महेन्द्र तिवारी महामंत्री, डा. वी.के. वर्मा (90) तथा अमित सिंह (77) उपाध्यक्ष, राकेश चन्द्र श्रीवास्तव बिन्नू कोषाध्यक्ष, सर्वेश कुमार श्रीवास्तव संगठन मंत्री और वशिष्ठ पाण्डेय सम्प्रेक्षक चुने गये। 


जबकि संरक्षक पद पर दिनेश सिंह, अशोक श्रीवास्तव, अध्यक्ष पद पर सलामुद्दीन, सुदृष्टि नारायण त्रिपाठी, उपाध्यक्ष पद पर सीपी शर्मा, तबरेज आलम, संगठन मंत्री पद पर अरूणेश श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष पद पर शहंशाह आलम तथा सम्प्रेक्षक पद पर अश्वनी शुक्ल को हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही राघवेन्द्र प्रसाद मिश्र 98, सैय्यद जीशान हैदर रिजवी 83, विपिन बिहारी तिवारी 96, रचना दूबे 79, राजेन्द्र कुमार उपाध्याय 101, राजेश कुमार पाण्डेय 92, संजय विश्वकर्मा 68 वोट पाकर कार्यकारिणी सदस्य चुने गये। जबकि इमरान अली 59, संतोष तिवारी 61, वीर कुमार तिवारी 59, आनंद कुमार गुप्ता 43 वोट पाकर चुनाव हार गये।


एक वोट से हुई जीत

प्रेस क्लब चुनाव में महामंत्री पद पर निवर्तमान महामंत्री महेन्द्र तिवारी और पिछले चुनाव में उनके निकटतम प्रतिद्वन्दी रहे मनोज कुमार यादव के बीच कांटे का मुकाबला था। वोटों की गिनती के बाद पता चला महेन्द्र तिवारी दो वोट से चुनाव जीत गये। फूल मालाओ से स्वागत हुआ और प्रेस क्लब से कही अन्यत्र चले गये। कुछ देर बाद मनोज कुमार यादव पक्ष की ओर से वोटों की पुनः गिनती कराने की मांग की गई। दबाव बनाने प्रेस क्लब सदस्य व वरिष्ठ भाजपा नेता राजेन्द्रनाथ तिवारी भी पहुंचे। फिलहाल एसडीएम के आने पर वोटों की पुनः गिनती हुई और मनोज यादव को एक वोट से हार स्वीकार करनी पड़ी। इस बीच प्रेस क्लब में कुछ देर तक अफरा तफरी का माहौल बना रहा।



इनवैलिड हुये तमाम वोट

प्रेस क्लब का चुनाव प्रबुद्ध वर्ग का चुनाव होता है लेकिन वोट इतनी संख्या में इनवैलिड होते हैं जितने निरक्षर जाहिलों के नही होते। कुल पदों और सदस्यों पर जोड़ा जाये तो करीब 200 वोट इनवैलिड हुये। हालांकि नतीजों पर इसका कोई खास असर नही पड़ता लेकिन इतनी बड़ी संख्या में वोटों का इनवैलिड होने का कारण कुछ लोग त्रुटिपूर्ण चुनावी प्रक्रिया तो कुछ लोग ऐसे मतदाताओं को बता रहे हैं जिनका दूर दूर तक पत्र पत्रकारिता, समाचारों के लेखन, संपादन से कोई वास्ता ही नही है।


कुछ इस तरह है प्रेस क्लब की कहानी

आपको याद दिला दें 2016 से पहले प्रेस क्लब का चुनाव बंद कमरें में कुछ सदस्य मिलकर कर लेते थे, संगठन पूरी तरह से झोले मे रन कर रहा था। साल 2015 में कुछ गिने चुने लोगों ने व्यवहारिक तो कुछ ने कानूनी धरातल पर आन्दोलन किया कि प्रेस क्लब में लोकतांत्रिक तरीकों से चुनाव होना चाहिये।आखिरकार सफलता मिली और तभी से लगातार चुनाव होते आ रहे हैं। ये अलग बात है कि चुनावी प्रक्रिया बदली लेकिन किरदार नही बदले। 


2016 से पहले बंद कमरे मे एक प्रभावशाली व्यक्ति अध्यक्ष हो जाया करता था और दूसरा महामंत्री। चुनाव शुरू हुआ तो थोड़ा बदलाव हुआ और अध्यक्ष लगातार संरक्षक होने लगा और महामंत्री अब अध्यक्ष होने लगा। इसी परंपरा पर यह चुनाव भी सम्पन्न हुआ है। सोशल मीडिया के अनुमान सच साबित हुये और पुनः वही किरदार चुनकर सामने आये। दरअसल प्रेस क्लब का चुनाव अपने साथ हर बार एक खौफ लेकर आता है, वह खौफ है पैनल का। 


मसलन पैनल में करीब 100 मतदाता ऐसे है जो हुक्म का इंतजार करते हैं और समय आने पर पूरी स्वामिभक्ति दिखा देते हैं। 100 मतदाताओं के बाद बचते ही कितने हैं कि दूसरे प्रत्याशी जीत का दावा कर पायें। यही कारण है कि पैनल से जुड़े लोगों के चेहरे चुनाव में मुस्काराते रहते हैं और दूसरे प्रत्याशियों के चेहरों पर हवाइयां उड़ती हैं। सवाल ये है कि प्रेस क्लब का चुनाव क्या इतना महत्वपूर्ण है कि लोग इसमे जीत हासिल करने के लिये पानी की तरह पैसा और शराब बांटते हैं ? अपने चेहतों को प्रेस क्लब का सदस्य बनाकर कब तक अपनी जागीर समझेंगे लोग ?



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